राष्ट्रमण्डल खेल और दिल्ली की आम जनता

आज दिल्ली सरकार और सारा सन्चार मीडिया केवल राष्ट्रमण्डल खेलों के ऊपर ही केन्द्रित हो रहा है। इसी को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया गया है। सभी इसी जुगत में लगे हैं कि इन खेलों को सफलतापूर्वक कैसे किया जाये। इसमें चूक को बेइज्जती से जोड़ा जा रहा है। चारों तरफ शहर को सजाया जा रहा है और दिल्लीवासियों को “सुधारने” की  भी मुहिम चलाई जा रही है। मीडिया भी इसी का प्रचार करने में जुटा है।

राष्ट्रमण्डल या कॉमनवेल्थ क्या है?

आखिर राष्ट्रमण्डल है क्या? यह उन देशों का समूह है जो कभी अँग्रेज़ों के गुलाम थे। इसकी स्थापना 1931 में हुई थी उन देशों को लेकर जिन्होने अधीनस्थ सरकार या डोमिनियन स्टेटस स्वीकार करा था। कान्ग्रेस व उसके नेताओं ने भी यही मांग रखी थी। पूर्ण स्वराज्य मजबूरी में कुछ ही समय के लिये भगतसिन्ह आदि के आन्दोलन व आलोचना के दवाब में माना गया था। इसकी स्थापना वेस्टमिनिस्टर के नियम के अनुसार हुई और ब्रिटिश राजसिंहासन (ब्रिटिश क्राउन) से निष्ठा इसका आधार था। 1949 में लन्दन घोषणा में यह माना गया कि ब्रिटिश राजसिंहासन को जुड़ाव का आधार माना जाये। आरम्भ में इसके सदस्य ग्रेट ब्रिटेन (यानी इग्लैण्ड) आइरिश फ़्री स्टेट, कनाडा, न्यू फाऊण्ड लैण्ड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड व दक्षिण अफ़्रीका थे।  पचास के दशक से अँग्रेज़ों के आधीन रहे देश इसके सदस्य बने। भारत सरकार ने भी इसका सदस्य होना स्वीकार किया। आज इसमें लगभग 53 देश हैं। इसका मानद प्रमुख इग्लैण्ड की महारानी है और इसका एक महा सचिव भी होता है। इसका मुख्यालय लन्दन में है।

यह उल्लेखनीय है कि इस बात का उस समय की सभी देशभक्त व प्रगतिशील हल्कों ने विरोध किया था। प्रसिद्ध गीतकार मज़रूह सुलतान पुरी ने एक नज्म लिखी थी जिसमें पक्तियां थी ..कॉमन्वेल्थ का दास है नेहरू, देश का दुशमन जाने न पाये.. इस नज्म के कारण तत्कालीन बॉम्बे राज्य के मुख्यमन्त्री मोरारजी देसाई ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और शर्त रखी थी कि यदि वे माफ़ी माँगें तो उन्हें छोड़ा जा सकता है। मज़रूह ने कहा कि माफ़ी मांगना विचारधारा से समझौता होगा जो उन्हें मन्जूर नहीं, अतः उन्होने जेल जाना स्वीकार किया।

राष्ट्रमण्डल खेलों का इतिहास

हालांकि 1891 में ही अंग्रेजी साम्राज्य के  देशों के बीच खेलों के आयोजन की बात की गयी थी और रेवेरेन्ड एस्ट्ले कूपर ने सुझाव दिया कि हर चार वर्ष में ऐसे उत्सव से अंग्रेजी  साम्राज्य के प्रति सद्भावना  बढ़ेगी, पर पहली बार ऐसा औपचारिक आयोजन 1911 में जॉर्ज पन्चम के राजतिलक पर साम्राज्य के उत्सव का आयोजन किया गया इसी में अन्तर-साम्राज्य खेल प्रतियोगिता रखी गयी जिसमें चार देशों ने भाग लिया  । 1930 में पहली बार कनाडा में अंग्रेजी साम्राज्य खेल आयोजित किये गये। ये हर चार साल में  आयोजित किये जाते रहे। केवल द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ये नहीं हो सके और 1950 में पुनः आयोजित किये गये। इसकी परेड का नेतृत्व ब्रिटिश झ्ण्डे युनियन जैक लिए एक ध्वज वाहक करता था। 1954 में इसे अंग्रेजी साम्राज्य व राष्ट्रमण्डल खेल (British Empire and Commonwealth Games) नाम दिया गया। 1958 से परेड क नेतृत्व अंग्रेजी राजमहल- बकिन्गहॅम पैलॅस से महारानी के सन्देश लिये एक छड़ी से रिले (क्रमिक) रेस द्वारा देशों के प्रमुख खिलाड़ियों द्वारा मेजबान देश तक लायी जाती है, जिसे मेजबान देश का कोई प्रसिद्ध खिलाड़ी खेल स्थल तक ले जाता है।

1970 में इसके नाम से अंग्रेज साम्राज्य हटा कर केवल अंग्रेज राष्ट्रमण्डल खेल (British Commonwealth Games) रखा गया और 1978 से इन्हें राष्ट्रमण्डल खेल (Commonwealth Games) कहा जाने लगा। इसकी संरक्षक है ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ हैम और उप-संरक्षक है राजकुमार एडवर्ड (वेसक्स के अर्ल- एक खास सामन्ती ओहदा)।

इस प्रकार इस संक्षिप्त इतिहास से ही स्पष्ट है कि राष्ट्रमण्डल ये खेल, दोनों ही देश की जनता की भावनायों तथा सम्मान को परे रख बरकरार गुलामी का ही प्रतीक हैं। आखिर क्यों अपने उपर बर्बर शासन करने वाले अँग्रेज़ों द्वारा निदेशित संगठन में शामिल होना स्वीकार किया गया? शायद इन खेलों के ज़रिये भारत व दिल्ली सरकार और सभी संसदीय राजनीतिक पार्टियाँ अँग्रेज़ों को दिखाना चाहती हैं कि उनके गुलामों के वंशज किस तरह से नाचते, कूदते, खेलते हैं।

दिल्ली के खेल: राष्ट्रमण्डल खेल 2010:

आयोजन की भव्यता

इन खेलों का आयोजन अत्यन्त भव्य स्तर पर किया जा रहा है। ऐसा प्रचारित किया जा रहा है कि मानो ये खेल  ही देश की प्रतिष्ठा हैं। इस पर लगभग रू. 4000 करोड़ खर्च किये जायंगे। यह पुन: अनुमानित बजट है जो  आरम्भिक बजट रू. 767 करोड़ से कई गुना अधिक है। अर्थात एक कम बजट के साथ पास करा कर अब प्रतिष्ठा से जोड़ कर कुछ भी खर्च करो। जाहिर है इस खर्च का एक बड़ा हिस्सा अधिकारियों व नेताओं की जेब के हवाले होगा। और  अभी भी बढ़ती महंगाई के नाम पर इसमें लगातार वृद्धि की जा रही है। अक्तूबर तक कितने अरब खर्च होंगे कुछ ठिकाना नहीं।

इन खेलों के लिये जहां कई भव्य स्टेडियम बनाये जा रहें हैं, कई आरामगाहे तैयार की जा रहीं हैं, पूरे शहर का कायाकल्प करा जा रहा है। 26 नये फ़्लाईओवर, मेट्रो की नई लाइनें, नयी सड़कें, पुरानी सड़कों का पुनर्निर्माण, आदि भी बनाये जा रहे हैं।

12 दिन तक चलने वाले ये खेल 3 अक्तूबर 2010 को शुरु हो कर 14 अक्तूबर को समाप्त होंगे। इनमें 71 टीमों के 8000 खिलाड़ी व अधिकारी भाग लेंगे 17 खेलों के लिये  23 अत्याधुनिक (विश्व स्तरीय) स्टेडियम व 32 सर्व सुविधासम्पन्न अभ्यास स्थल बन रहें हैं। 30000 स्वयं सेवक कार्यरत होंगे। आवास के लिये सभी प्रकार के कुल मिला कर लगभग चालीस हजार कमरे पूरे दिल्ली में उपलब्ध करायें जायंगे। सभी देशों के 5000 मान्यता प्राप्त मीडिया रहेगा।

दिल्ली के सौन्दर्य करण के नाम पर करोड़ों खर्च किये जा रहें हैं। दो पुराने बाजार- गोल मार्केट और कनॉट प्लेस -को एक दम बदला जा रहा है और  अनेक स्थलों को restore  किया जा रहा है। सड़कों का चौड़ा करण, सुदृढ़ीकरण और पुन: निर्माण किया जा रहा है। खेल के स्थलों से 2 किलोमीटर के दायरे में सड़कों के इर्दगिर्द को सुन्दर (अर्थात लोगों, दुकानों, रेड़ी पटरी झुग्गियों आदि को उजाड़ा जायेगा) बनाया जायेगा। पानी, बिजली सफाई आदि पर भी भीषण खर्चा किया जायेगा।  करीब 3500 लो फ़्लोर बसें, 1000 वातानुकूलित बसें और 574 खिलाडियों के लिये आरक्षित बसें होंगी। चिकित्सा सुविधाये व केन्द्र भी स्थापित किये जा रहें हैं।

खिलाडियों के निवास के लिये एक खेल गाँव बनाया जा रहा है। यह अक्षर धाम मन्दिर के पास यमुना नदी के किनारे 158.4 एकड़ जमीन में होगा जिसमें 1168 वातानुकूलित फ़्लैट्स होंगे जिन्हें बाद में करोड़ों में बेचा जायेगा।

सरकार के पास इतना पैसा खेलों पर खर्च करने को है पर जनता की कल्याण कारी योजनायों के लिये नहीं है। राशन व्यवस्था ठप्प की जा रही है, सब्सिडियां खत्म की जा रही है, रोजगार लगातार कम हो रहे है, पर उसके लिये घाटा, व आर्थिक संकट है पर चन्द दिनों कीअय्याशी के लिये किसी प्रकार का अभाव नहीं है।

किस का गर्व- किस पर गर्व?

प्रश्न यह है कि आखिर इन खेलों से किस का भला होने जा रहा है? दिल्ली की जनता का? खेलों का?

यदि खेलों की ही बात करें तो यह बात काबिलेग़ौर है कि 1982 में एशियाई खेलों के समय भी यही कहा गया था। पर क्या हुआ? क्रिकेट को छोड़ कर  शायद ही किसी खेल पर ध्यान दिया गया होगा। 1982 से पहले एथलेटिक्स(दौड़-कूद आदि) में एशिया स्तर पर भारत कुछ था भी अब वो भी नहीं रह गया है। जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में बाद में क्रिकेट के दिन रात के मैच होने लगे। इन्द्रप्रस्थ स्टेडियम( बाद में इन्दिरा गांधी स्टेडियम) में संगीत आदि के कार्यक्रम होने लगे। यमुना वेलोड्रोम के बाद भी साइकल चालन में कुछ भी उपलब्धि नहीं। यहां तक कि घोषित राष्ट्रीय खेल हॉकी में भारत लगातार पिछड़ता ही रहा और न ही उस पर कोई ध्यान दिया गया; यहां तक कि हाल में हॉकी खिलाडियों को अपनी तन्खा के लिये हड़ताल करनी पड़ी। इन स्टेडियम का रख-रखाव ही एक बोझ बन गया है।

इन खेलों के लिये दिल्ली की गंदगी मान कर दिल्ली की 65% जनता जो झुग्गी-झोपड़ी या कच्ची कॉलोनियों में रहती है को बेघर किया जा रहा है। जो लोग रेड़ी पटरी लगा कर अपने परिवार क गुजारा करते हैं, उन्हें बेरोजगार किया जा रहा है। दिल्ली महापौर ने तो यह भी कह दिया कि उस एक महीने में दिल्ली की फ़ैक्ट्रियां बन्द कर देनी चाहिये। एक माह तक कौन मज़दूरों के परिवार को पालेगा। शायद दिल्ली को औद्योगिक शहर को पूर्ण व्यावसायिक शहर बनाने की मुहिम को इससे अच्छा बहाना और कहाँ व कैसे मिलता? आज  दिल्ली की सफ़ाई के नाम पर दिल्ली की दो तिहाई जनता को ही गन्दगी मान कर बाहर फेंका जा रहा है।

इन खेलों के लिये विभिन्न विकास कार्य, निर्माण कार्यों में व्यापक ठेकेदारी है, श्रम क़ानूनों का कुछ पता ही नहीं, अमानवीय स्तिथियों में यहां मजदूर दिन रात खटाये जा रहे हैं। कितने मजदूर आये दिन दुर्घटना में मरते हैं न तो उनको कुछ मिलता है, न कोई सुरक्षा मानक/साधन का इस्तेमाल किया जाता है और न ही उन बड़ी कम्पनियों या ठेकेदारों के खिलाफ कुछ होता है। सुप्रीम कोर्ट ने तो यह भी कह दिया है कि भिखारियों को उनके मूल (native) स्थान पर छोड़ आया जाये। इस लपेट में कितने आयेगें और बेघर बेरोजगार हुए कितने लोग भिखारी बनने को मजबूर होंगे ।

खेल गाँव सहित अनेक निर्माण पर्यावरण के महा विनाश की कीमत पर हो रहा है। इसी पर्यावरण के नाम पर कुछ साल पहले दिल्ली के लघु उद्योगों को तबाह कर लाखों लोगों को बेरोजगार किया गया था। अब यह पर्यावरण चेतना न सरकार के पास है, न उन एन जी ओ के पास और न ही कोर्टों के पास। खेल गाँव को यमुना तट पर सभी पर्यावरण के मानकों, विरोधों के बावजूद बनाया गया है। इसी प्रकार अनेक निर्माण में पेड़ काटें जा रहे हैं। दिल्ली विश्व विद्यालय में अभ्यास के लिये बनाये जा रहे स्टेडियम के लिये छात्रों, पर्यावरणविदों के विरोध को नजर अन्दाज किया गया। अनेक मेट्रो लाइनों के लिये भी यही हाल है।

साथ ही एक  झूठी अन्ध देश भक्ति की भावना का प्रचार करा जा रहा है मानो ये खेल देश की प्रतिष्ठा से जुड़ें हों। आश्चर्य है कि इस सरकार को इस बात पर शर्म नहीं आती कि लोग भूखे सोते है, अमानवीय स्तिथियों में कुत्ते की तरह रहने को मजबूर हैं, उसके अपने बनाये कानून ही वो लागू नहीं कर पा रही, लोगों को सही या कैसा भी रोजगार नहीं मिल पा रहा, स्कूलों में ढंग से पढ़ाई नहीं होती। व्यापक भ्रष्टाचार लोगों को कल्याणकारी योजनायों से दूर रखता है , पुलिस द्वारा झूठे कैसों में लोग यूँ ही फँसते रहते हैं, दिल्ली लड़कियों के लिये बेहद असुरक्षित शहर है- शायद यह इनके लिये गर्व का विषय होगा॥ पर चंद दिनों के उन विदेशी मेहमानों को असलियत न दिखे व उनकी सुविधायों में कमी न हो यह ही देश को इज्जत दिला पायेगा।

इसमें अनेक बड़े पूंजीपति लाभान्वित होंगे। निर्माण, परिवहन, होटल, विज्ञापन, सेवा, आदि उद्योगों में ढेरों मुनाफा कमाया जायेगा। वो इसमें सबसे ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं और सरकारी तन्त्र कमीशन खाने में।

इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि ये खेल न तो किसी प्रकार से देश का गर्व हैं, बल्कि राष्ट्रमण्डल की अवधारणा ही गुलामी का प्रतीक है। न ही इनसे जनता का भला होने वाला है उलटे वह उजाड़ी जायेगी, बर्बाद होगी। और तो और खेलों का भी विकास नहीं होगा। केवल चन्द लोग अपने थैलों को और भरेगें। अंतः  इसका पुरज़ोर विरोध किया जाना चाहिये और सरकारी प्रचार को बे पर्दा किया जाना चाहिये।

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